दादा गुरुदेव श्री जिनदत्तसूरि जी की देह का अग्निसंस्कार किया गया तब एक दिव्य चमत्कार हुआ। ऐसा आज तक कभी नहीं हुआ, कभी नहीं सुना गया। उनकी काया जल गई परंतु उनके द्वारा धारण किए गए वस्त्र नहीं जले। न चादर जली, न चोलपट्टा जला, न मुहंपत्ती जली। यह चमत्कार देखकर लोग विस्मय से भर उठे। तभी देव वाणी हुई – ये चमत्कारी वस्त्र संघ को सदा सदा संकटों से बचाएगा। दादा जिनदत्तसूरि ने सौधर्म देवलोक के टक्कलक विमान में देवरूप में जन्म लिया है।
इतिहास कहता है कि वस्त्र देवशक्ति से पाटण के जैन मंदिर में पहुंचे। कुछ शताब्दियों पश्चात जैसलमेर में महामारी का भीषण प्रकोप हुआ, उस समय राजाज्ञा से दादा गुरुदेव के वस्त्र को पाटण से जैसलमेर लाया गया। उन वस्त्रों से स्पर्शित जल को अभिमंत्रित करके पूरे जैसलमेर नगर में छिड़का गया जिससे महामारी से मुक्ति मिली। तब से गुरुदेव के ये चमत्कारी वस्त्र जैसलमेर के ज्ञान भंडार में सुरक्षित है।
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