6-8 March 2026, जैसलमेर |हेल्पलाइन: +91 9216047412 (Mon-Sat 10.00 am - 06.00 pm) |सीमित सीटें उपलब्ध हैं। पंजीकरण 25th Feb 2026 तक खुला है। 6-8 March 2026, जैसलमेर |हेल्पलाइन: +91 9216047412 (Mon-Sat 10.00 am - 06.00 pm) |सीमित सीटें उपलब्ध हैं। पंजीकरण 25th Feb 2026 तक खुला है। 6-8 March 2026, जैसलमेर |हेल्पलाइन: +91 9216047412 (Mon-Sat 10.00 am - 06.00 pm) |सीमित सीटें उपलब्ध हैं। पंजीकरण 25th Feb 2026 तक खुला है। 6-8 March 2026, जैसलमेर |हेल्पलाइन: +91 9216047412 (Mon-Sat 10.00 am - 06.00 pm) |सीमित सीटें उपलब्ध हैं। पंजीकरण 25th Feb 2026 तक खुला है। 6-8 March 2026, जैसलमेर |हेल्पलाइन: +91 9216047412 (Mon-Sat 10.00 am - 06.00 pm) |सीमित सीटें उपलब्ध हैं। पंजीकरण 25th Feb 2026 तक खुला है।

दादा गुरुदेव श्री जिनदत्तसूरि

जैन धर्म के वर्तमान काल के 24 वें तीर्थंकर महावीर स्वामी ने केवलज्ञान प्राप्त होने के पश्चात, चतुर्विध संघ साधु-साध्वी, श्रावक-श्राविका की स्थापना की। महावीर स्वामी के मोक्ष पधारने के पश्चात संघ संचालन गणधर सुधर्मा स्वामीजी ने किया, सुधर्मा स्वामी की पाट परम्परा में श्री जिनदत्तसूरि 41 वें आचार्य बनें, और पहले दादा गुरुदेव के नाम से प्रसिद्ध हुए। 

श्री जिनदत्तसूरि जी का जन्म विक्रम संवत 1132 में धवलक्कपुर-धोलका में मंत्री वाछिगसा के गृहांगन में माता वाहडदेवी की रत्न कुक्षि से हुआ। माता ने स्वप्न में चंद्रमा देखा फलस्वरूप बालक का नाम सोमचंद्र रखा गया। सोमचंद्र बचपन से ही बहुत प्रज्ञावान एवं वैराग्यवान थे। विक्रम संवत् 1141 में नव वर्ष की आयु में ही धर्मदेव उपाध्याय के द्वारा दीक्षित हुए और विक्रम संवत 1169 वैशाख सुदी 1 को आपको चित्तौड़ नगर में विराट जनभेदिनी के समक्ष आचार्य पद से विभूषित किया गया।

जन्म संवत् 1132
जन्म गाँव धोलका (गुजरात)
जन्म नाम सोमचंद्र
पिता वाछिग सा. मंत्री
माता वाहडदेवी
गोत्र हुंबड
दीक्षा संवत् 1141
गुरु नाम उपाध्याय श्री धर्मदेवगणि
आचार्य पद संवत् 1169, वैशाख शुक्ल 1, चित्तौड़
स्वर्गवास संवत् 1211, आषाढ़ शुक्ला 11
स्वर्ग भूमि अजमेर (राज.)

संस्कार-शैथिल्य से संस्कार-मय समाचारी

जिनशासन को चरमोत्कर्ष पर पहुंचाने वाले, समय-प्रभाव से जैन संप्रदाय में आयी हुईं कुरीतियों, कदाचारों, कदाग्रहों व शिथिलाचारों का अपनी दृढ़, विवेकमयी व क्रान्तिमयी विचार धारा से समूल उच्छेद करने वाले युगप्रधान आचार्यों में सर्वातिशायी चमत्कार व प्रभाव से अलंकृत अलौकिक महापुरुष अर्थ की प्रतीति होती है। दादा गुरुदेव के चारित्र प्रभाव से आकृष्ट होकर चैत्यवासियों तक ने सुविहित वसतिवास को स्वीकार किया।

प्रतिबोध, युगप्रधान पदप्राप्ति

अनेक राजा महाराजाओं को भी आपने धर्मदेशना दी। जैसे-त्रिभुवनगिरी के महाराजा कुमारपाल, अजमेर के महाराज अर्णोराज आदि। गुरुदेव की साधना इतनी गहन थी कि लाखों की संख्या में देवी देवता उनके श्री चरणों में रहते थे। इतिहास के अनुसार पांच पीर, 52 वीर, चौंसठ योगीनियां तथा काले गोरे भैरव की गणना उनके परम भक्तों में होती हैं। चौंसठ योगिनियों ने गुरुदेव की साधना से प्रभावित होकर उन्हें सात वरदान प्रदान किए थे। 

नागदेव की तपस्या से प्रभावित होकर देवी अंबिका ने उसके हाथों में गुप्तभाषा में एक पद्य लिखा और कहा-जो इसे पढ़ेगा, उसे युगप्रधान मानना! जब वह दादा जिनदत्त सूरि के पास पहुंचा! गुरुदेव ने गुप्त पद्य को पलभर में पढ़ लिया, अपना नाम पढ़कर उस पर वासचूर्ण डाला। शिष्य ने पढ़ा – 

दासानुदासा इव सर्वदेवाः यदीय पादाब्जतले लुठन्ति ।
मरुस्थली कल्पतरुःस जीयाद, युगप्रधानो जिनदत्तसूरि: ॥

तब से दादा जिनदत्तसूरि ‘युगप्रधान’ कहलाए।

वचन सिद्ध-चमत्कार सिद्धि

गुरुदेव के आचरण-वचन से प्रवाहित होने वाली ऊर्जा में एक चमत्कार था।

  • सम्राट् विक्रमादित्य द्वारा बसाए नगर विक्रमपुर में एक समय महामारी का भयंकर प्रकोप था। प्रतिदिन सैंकड़ों लोग काल कवलित हो रहे थे। गुरुदेव की तपःपूत साधना के दिव्य प्रभाव से महामारी का प्रकोप शांत हो गया। गुरुदेव द्वारा अभिमंत्रित जल के छिड़काव से महामारी सर्वथा नष्ट हो गई।

  • उच्चानगर में प्रवेश के समय श्रद्धा के उमड़ते सैलाब में एक बालक भीड़ के पांवों से कुचल गया। धर्म की निंदा अपभ्राजना होने लगी। गुरुदेव ने आदेश के स्वरों में कहा – “उठो वत्स!” अगले ही पल आहत बालक स्वस्थता से खड़ा हो गया। वचन सिद्धि के ऐसे अनेक अन्य उदाहरण हैं।

  • कड़कती बिजली को स्तंभिनी विद्या के द्वारा पात्र तले स्तंभित करना।

  • रुद्रपल्ली में मंत्र–तंत्र से परिपूर्ण गणधर सप्ततिका नामक ग्रन्थ से उपद्रव का मिटना।

  • आभू भंसाली के आवास गृह के चारों और अभिमंत्रित रजोहरण को घुमाकर सुरक्षा प्रदान करना।

  • जिनमंदिर के आगे रखी मृत गाय का गुरुदेव की दृष्टि पड़ते ही उठ खड़ा होना।

  • मंडोर में विष मिश्रित भोजन से पीड़ित राजकुमार का आंख खोलकर खड़ा हो जाना।

  • दृष्टिहीन व्यक्ति के निवेदन पर वासक्षेप डालने से अंध व्यक्ति का सुनयन बन जाना।

ओसवाल वंश का विस्तार

गुरुदेव ने अपने समय में अनेक नरेशों सहित लाखों लोगों को सम्यक्त्व का बोध करा कर जीवन जीने की कला सिखाई। आपने अपने जीवनकाल में एक लाख तीस हजार परिवारों पर जैन धर्म की वासक्षेप डाल कर ओसवाल वंश की वृद्धि की। एक ही समय में 1200 दीक्षा: गुरुदेव के दिव्य व्यक्तित्व के प्रभाव से एक ही संयम मंडप में 500 पुरुषों और 700 महिलाओं ने एक साथ भागवती दीक्षा ग्रहण करके उनका शिष्यत्व स्वीकार किया। इतनी बड़ी संख्या में सामूहिक दीक्षा का आयोजन परमात्मा महावीर के शासन में गौतमस्वामी के पश्चात पहली बार हो रहा था।

साहित्य साधना

आचार्य श्री जिनदत्तसूरि की रचनाओं को तीन भागों में विभाजित किया जा सकता है..

1. स्तुति परक साहित्य

2. औपदेशिक साहित्य

3. प्रकीर्णक साहित्य 

गणधर सार्धशतक स्तुति परक रचनाओं में सर्वश्रेष्ठ उच्चकोटि का उत्तम ग्रन्थ है। प्राकृत भाषा में लिखा गया यह ग्रंथ भाषा व विषयवस्तु की दृष्टि से अद्भुत है। इसी प्रकार गणधर सप्ततिका भी स्तुति परक अनूठा ग्रन्थ है। औपदेशिक साहित्य की गणना में उनका प्रश्नोत्तर शैली में लिखा संदेह दोलावली ग्रन्थ समाधान देता है। इसी प्रकार उत्सूत्र पदो‌द्घाटन कुलक, चैत्यवंदन कुलक, उपदेश कुलक आदि अनूठी कृतियां औपदेशिक शैली में लिखी गई है। उपदेश धर्म रसायन, काल स्वरूप कुलक, चर्चरी आदि ग्रंथों की रचना उन्होंने उस समय की बोलचाल भाषा में अर्थात् अपभ्रंश भाषा में की, इन ग्रंथों में इनके पांडित्य, शास्त्रीय अवगाहन व गंभीर चिंतन परिलक्षित होता है

युगप्रधान पद जन हितकारा, अंबड़ मान चुर्ण कर डारा।
मात अंबिका प्रकट भवानी, मंत्र कलाधारी गुरु ज्ञानी ।

अंतिम समय का चमत्कार

वि.सं.1211 का उनका चातुर्मास अजमेर में होना था। अजमेर के राजा अर्णोराज और सकल संघ की विनंती सुनकर उन्होंने कहा- अजमेर में आऊंगा, पर एक दिन के लिये या एक चातुर्मास के लिये नहीं, अपितु सदा सदा के लिये। अजमेर की भूमि के आमंत्रण को मुझे स्वीकार करना ही है क्योंकि यही नियति का संदेश है। और नियति के संदेश को कभी भी…कोई भी अन्यथा नहीं कर सकता। गुरुदेव श्री अजमेर पधारे। आषाढ़ सुदि 11का मंगल प्रभात! गुरुदेव श्री ने अनशन स्वीकार कर लिया था। नवकार महामंत्र का जाप प्रारंभ था। वे अपने ध्यान में लीन हो गए थे। आत्म लीनता के उस वातावरण में गुरुदेवश्री का स्वर्गवास हो गया।

दादा गुरुदेव व दादावाड़ी

इस जग में आज कोई ऐसा जैनी नहीं होगा जो पूज्य दादा गुरुदेव के नाम से परिचित न हो। केवल जैनी ही नहीं, जैनेतर भी अधिकांश व्यक्ति दादा के नाम से पूर्ण परिचित हैं। तभी तो देश के कोने-कोने में “दादावाड़ी” नाम से प्रसिद्ध स्थानों ने इस शब्द से प्रत्येक नागरिक को परिचित बना दिया है। इन स्थानों में जाने से प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप में एक अलौकिक शांति का अनुभव होता है।

महोत्सव स्थल

 जैसलमेर (राजस्थान)

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कार्यक्रम तिथि

दिन
06/03/2026 (शुक्रवार)
07/03/2026 (शनिवार)
08/03/2026 (रविवार)

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